बाबासाहेब की प्रतिज्ञा: कृष्ण की पूजा और जन्माष्टमी से दूरी क्यों?
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डॉ. बी. आर. आंबेडकर के विचारों पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह समझना अनिवार्य है कि बाबासाहेब ने पारंपरिक अवतारवाद, कृष्ण की उपासना और जन्माष्टमी जैसे उत्सवों को त्यागने का स्पष्ट आह्वान क्यों किया था। बाबासाहेब का विरोध सतही नहीं, बल्कि सामाजिक गैर-बराबरी की जड़ों पर वैचारिक प्रहार था।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि में बौद्ध धम्म स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाईं। पहली दो प्रतिज्ञाएं हिंदू त्रिमूर्ति और प्रमुख अवतारों को पूरी तरह अस्वीकार करती हैं:
प्रतिज्ञा 1: "मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं रखूंगा और न ही उनकी पूजा करूंगा।"
प्रतिज्ञा 2: "मैं राम और कृष्ण, जिन्हें ईश्वर का अवतार माना जाता है, उनमें कोई विश्वास नहीं रखूंगा और न ही उनकी पूजा करूंगा।"
बाबासाहेब ने स्पष्ट किया कि जब तक शोषित समाज उन प्रतीकों की पूजा करता रहेगा जिन्होंने जाति-व्यवस्था को धार्मिक संरक्षण दिया, तब तक वास्तविक मुक्ति असंभव है। 'रिडल्स इन हिंदुइज़्म' (Riddles in Hinduism) में उन्होंने कृष्ण के चरित्र और उनके राजनीतिक दर्शन का विश्लेषण करते हुए लिखा:
उद्धरण 3: "कृष्ण एक राजनीतिक अवसरवादी के सिवा कुछ नहीं थे, जो पांडवों को सिंहासन पर बैठाने में सफल रहे। उनका नैतिक चरित्र निम्न है।"
बाबासाहेब के अनुसार, कृष्ण से जुड़े धर्मग्रंथ—विशेषकर भगवद्गीता—वर्ण व्यवस्था को दार्शनिक आधार देकर स्थाई बनाने का साधन बने। अपनी रचना 'रिवोल्यूशन एंड काउंटर-रिवोल्यूशन इन एंशिएंट इंडिया' (Revolution and Counter-Revolution in Ancient India) में उन्होंने लिखा:
उद्धरण 4: "भगवद्गीता न तो धर्म की पुस्तक है और न ही दर्शन का ग्रंथ। भगवद्गीता जो करती है, वह है कुछ धार्मिक रूढ़ियों का दार्शनिक आधार पर बचाव करना... भगवद्गीता जिस चीज़ का दार्शनिक बचाव करने आगे आती है, वह चातुर्वर्ण्य है।"
बाबासाहेब का मानना था कि सामाजिक बदलाव केवल राजनीतिक या आर्थिक सुधारों से नहीं आ सकता, जब तक उस धार्मिक व्यवस्था को न नकारा जाए जो गैर-बराबरी को ईश्वरीय विधान बताती है। 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' (Annihilation of Caste) में उन्होंने निर्देश दिया:
उद्धरण 5: "आपको न केवल शास्त्रों को त्यागना होगा, बल्कि उनके प्राधिकार (अधिकार) को भी नकारना होगा, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। जाति का एक दैवीय आधार बना दिया गया है; इसलिए आपको उस पवित्रता और दिव्यता को नष्ट करना होगा जो जाति के साथ जोड़ दी गई है।"
यदि कोई स्वयं को बाबासाहेब का सच्चा अनुयायी मानता है, तो उसके लिए कृष्ण-पूजा और जन्माष्टमी जैसे आयोजनों से अलग होना केवल एक व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि 22 प्रतिज्ञाओं और आत्मसम्मान के संघर्ष के प्रति एक सैद्धांतिक प्रतिबद्धता है।
