संतुलन की कीमत: व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हम किसी को "टूटा हुआ" क्यों बनाते हैं?

संतुलन की कीमत: व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हम किसी को "टूटा हुआ" क्यों बनाते हैं?

जब हम सामाजिक पदानुक्रमों (social hierarchies), बिखरे हुए पारिवारिक ढांचों, या व्यवस्थागत बहिष्कार को देखते हैं, तो हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति इन्हें एक संरचनात्मक विफलता (structural failure) के रूप में देखने की होती है। हम हाशिए पर मौजूद लोगों, परिवार के "ब्लैक शीप" (कुलकलंक माने जाने वाले), या मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे किसी व्यक्ति को इस व्यवस्था के शिकार के रूप में देखते हैं।

लेकिन समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और इतिहास पर करीब से नज़र डालने पर एक गहरा और कड़वा सच सामने आता है: यह नुकसान कभी भी आकस्मिक नहीं होते। ये कार्यात्मक (functional) होते हैं।

अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और उच्च-दबाव वाले वातावरण में जीवित रहने के लिए, मानव समूह अक्सर एक आदिम, अचेतन प्रवृत्ति (unconscious reflex) दिखाते हैं—खुद को ऊपर खींचने के लिए किसी दूसरे को नीचे धकेलना। अपनी खुद की "सामान्यता", मानसिक संतुलन या श्रेष्ठता को साबित करने के लिए, समूहों को अक्सर एक विरोधी उदाहरण (contrast) की आवश्यकता होती है। वे एक टूटे हुए चरित्र का निर्माण करते हैं ताकि बाकी सभी लोग खुद को पूर्ण महसूस कर सकें।

1. आंतरिक आईना: सूक्ष्म-बलि का बकरा (The Micro-Scapegoat)

छोटे, बंद दायरों में—जैसे कि एक संयुक्त परिवार या दोस्तों का एक करीबी समूह—अक्सर एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसे सामूहिक रूप से सबसे अस्थिर, उग्र या "बर्बाद" घोषित कर दिया जाता है। यह टैग कोई सचेत साज़िश नहीं है; यह सामूहिक आत्म-संरक्षण का एक अचेतन कार्य है।

फ्रांसीसी दार्शनिक रेने गिरार्ड (René Girard) ने इसे 'स्केपगोट मैकेनिज्म' (बलि का बकरा तंत्र) के रूप में पहचाना। गिरार्ड का तर्क था कि मानव समुदायों में स्वाभाविक रूप से आंतरिक तनाव, ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता जमा होती है। अगर इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह घर्षण समूह को छिन्न-भिन्न कर देगा। खुद को बचाने के लिए, समूह सहज रूप से इस अराजक ऊर्जा को एक अकेले लक्ष्य (target) पर मोड़ देता है।

"किसी एक व्यक्ति को 'समस्या' के रूप में चिन्हित करके, बाकी समूह तुरंत आपस में एकजुट हो जाता है। वह बलि का बकरा समूह की छिपी हुई चिंताओं और कमियों का बोझ उठाता है। जब परिवार के सदस्य उस 'कमज़ोर या बीमार' रिश्तेदार की तरफ उंगली उठाते हैं और चुपचाप सहमत होते हैं कि वही अस्थिर तत्व है, तो वे अपने लिए एक सुरक्षा कवच बना रहे होते हैं: 'जब तक वे पागल हैं, तब तक हम समझदार हैं।'"

यह डायनामिक इरविंग गोफमैन (Erving Goffman) के 'स्टिग्मा' (कलंक) पर किए गए काम से भी पुख्ता होता है। गोफमैन ने दिखाया कि कैसे सामाजिक समूह विशिष्ट व्यक्तियों को त्रुटिपूर्ण या अविश्वसनीय मानकर अपनी 'दूषित पहचान' (spoiled identities) को मैनेज करते हैं। यह मार्किंग "सामान्य लोगों" को पीड़ित की कीमत पर एक आरामदायक मनोवैज्ञानिक आधार देते हुए, उनकी खुद की पहचान को सही ठहराने का मौका देती है।

2. व्यापक मैट्रिक्स: व्यवस्थागत विचलन और जाति (Systemic Deflection and Caste)

सामूहिक अस्तित्व के लिए दूसरों को नीचे धकेलने की यह सूक्ष्म-स्तर की प्रवृत्ति, जब पूरी आबादी में फैलती है, तो बड़े और कठोर सामाजिक ढांचों का रूप ले लेती है। इसका सबसे स्पष्ट और ऐतिहासिक रूप जाति व्यवस्था है।

अपने ऐतिहासिक 1936 के भाषण 'जाति का उच्छेद' (Annihilation of Caste) में, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने विश्लेषण किया था कि कैसे भारतीय जाति समाज केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि एक पदानुक्रमित मनोवैज्ञानिक किला (hierarchical psychological fortress) है। जाति व्यवस्था "श्रेणीबद्ध असमानता" (graded inequality) की एक प्रणाली है जहाँ हर स्तर अपने से नीचे के स्तर के होने में मनोवैज्ञानिक सुकून पाता है।


डॉ. अंबेडकर ने प्रदर्शित किया कि शासक या उच्च वर्ग जानबूझकर "अपवित्रता" और सामाजिक बहिष्कार की अवधारणा को बनाए रखते हैं। पिरामिड के बाकी हिस्सों को स्थिर रखने के लिए सबसे निचली सतह का होना अनिवार्य है। यह एक निश्चित निचला स्तर (absolute bottom) प्रदान करता है।

ऊपर के वर्गों के लिए, यह जानना कि कोई और हमेशा के लिए अस्तित्व के सबसे निचले तल पर धकेल दिया गया है, एक आदिम चिंता को शांत करता है: उनका अपना जीवन चाहे कितना भी असुरक्षित क्यों न हो, वे कम से कम सबसे नीचे नहीं हैं। यह व्यवस्था जानबूझकर लोगों के एक वर्ग को बुनियादी रूप से 'टूटा हुआ' रखती है ताकि बाकी सभी के लिए सापेक्ष सुरक्षा की स्थायी भावना की गारंटी दी जा सके।

3. असहमति का रोगविज्ञान: "पागल" को परिभाषित करना

मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संरचनाओं का अंतर्संबंध भी इसी धुरी पर काम करता है। जब कोई व्यक्ति किसी विषाक्त वातावरण, परिवार या कार्यस्थल के अत्यधिक दबाव में टूट जाता है, तो उस व्यवस्था की पहली प्रतिक्रिया खुद को सुधारने के बजाय उस व्यक्ति को 'बीमार' या 'विक्षिप्त' घोषित करने की होती है।

'मैडनेस एंड सिविलाइजेशन' (Madness and Civilization) में, मिशेल फूको (Michel Foucault) ने रेखांकित किया कि कैसे "मानसिक बीमारी" को ऐतिहासिक रूप से एक शुद्ध जैविक वास्तविकता के बजाय एक सामाजिक श्रेणी के रूप में निर्मित किया गया है। फूको ने तर्क दिया कि समाज उन लोगों को अलग-थलग करने और चुप कराने के लिए शरणस्थली (asylum) और क्लिनिकल लेबल का उपयोग करता है जो उत्पादन और सामाजिक व्यवस्था की कठोर मांगों के अनुरूप नहीं हो पाते।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति दो विपरीत दृष्टिकोण

आयाम (Dimension)मेडिकल मॉडल (The Medical Model)संरचनात्मक मॉडल - फूको/फैनन (The Structural Model)
मूल कारणआंतरिक रासायनिक असंतुलन या व्यक्तिगत कमज़ोरी।एक स्वाभाविक रूप से विषाक्त या दमनकारी वातावरण के प्रति सामान्य प्रतिक्रिया।
समूह का लक्ष्यव्यक्ति का अकेले में इलाज करना और उसे ठीक करना।व्यवस्था को आलोचना से बचाने के लिए व्यक्ति को "टूटा हुआ" घोषित करना।
परिणामव्यक्ति को दवा दी जाती है या वापस ढर्रे पर लाया जाता है।यथास्थिति (Status quo) पर कोई सवाल नहीं उठता; समूह खुद को सही मानता है।

जब किसी समूह द्वारा किसी व्यक्ति को "मानसिक रूप से क्षतिग्रस्त" का लेबल दिया जाता है, तो यह जवाबदेही के खिलाफ एक प्रभावी ढाल का काम करता है। यदि वह व्यक्ति पागल है, तो उसकी शिकायतें अमान्य हैं, उसका दर्द तर्कहीन है, और समूह का व्यवहार पूरी तरह से दोषमुक्त हो जाता है।

जैसा कि क्रांतिकारी मनोचिकित्सक फ्रॉन्त्ज़ फैनन (Frantz Fanon) ने 'द रेच्ड ऑफ द अर्थ' (The Wretched of the Earth) में उल्लेख किया है—जिसे हम मनोवैज्ञानिक पतन (breakdown) कहते हैं, वह अक्सर एक दमनकारी, उच्च-दबाव वाली प्रणाली के भीतर रहने का अपरिहार्य और अनुमानित परिणाम होता है। त्रासदी यह है कि व्यवस्था पीड़ित के टूटने को व्यवस्था की क्रूरता के प्रमाण के रूप में देखने के बजाय, उसकी अंतर्निहित कमज़ोरी के प्रमाण के रूप में देखती है।

4. शून्य-योग प्रतिक्रिया: झरने पर मची भगदड़ (The Zero-Sum Reflex)

किसी संकट में मनुष्यों की आदिम छवि—जैसे डूबने की स्थिति में अचानक होने वाला भयानक शारीरिक संघर्ष, या किसी विशिष्ट शैक्षणिक संस्थान का दम घुटने वाला माहौल—यह प्रकट करती है कि मानव व्यवहार कितनी जल्दी एक शून्य-योग गणना (zero-sum calculation) में बदल सकता है। जब पर्यावरण यह संकेत देता है कि संसाधन, स्थान या अस्तित्व बेहद सीमित हैं, तो सहयोग का मुखौटा गायब हो जाता है।

यह घबराहट डार्विनवाद की उस अंधकारमय व्याख्या की नकल करती है जिसे हरबर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) ने लोकप्रिय बनाया था, जिन्होंने सामाजिक शोषण को सही ठहराने के लिए "योग्यतम की उत्तरजीविता" (Survival of the fittest) शब्द गढ़ा था। स्पेंसर ने दावा किया कि जीवन एक क्रूर, प्राकृतिक छंटनी प्रक्रिया है जहाँ कमज़ोरों को डूबना ही है ताकि मज़बूत लोग ऊपर उठ सकें।

हालांकि, पीटर क्रोपोटकिन (Peter Kropotkin) जैसे विचारकों ने 'म्यूचुअल एड' (Mutual Aid - आपसी सहयोग) में इस ढांचे का कड़ा विरोध किया। क्रोपोटकिन ने देखा कि सामाजिक प्रजातियों में, अस्तित्व सहयोग से चलता है, न कि एक-दूसरे को काटने वाली प्रतिस्पर्धा से।

"आपसी सहयोग का अभ्यास करना प्रत्येक और सभी को सबसे बड़ी सुरक्षा, अस्तित्व और प्रगति की सबसे अच्छी गारंटी देने का सबसे पक्का साधन है।"

— पीटर क्रोपोटकिन

फिर भी, जब कोई सामाजिक संरचना कृत्रिम कमी (artificial scarcity) के इर्द-गिर्द डिज़ाइन की जाती है—चाहे वह अत्यधिक प्रतिस्पर्धी कॉर्पोरेट सीढ़ी हो या एक कठोर वर्ग पदानुक्रम—यह व्यक्तियों को स्पेंसर के त्रुटिपूर्ण ढांचे के भीतर काम करने के लिए मजबूर करती है। यह एक ऐसा माहौल बनाता है जहां लोगों को लगता है कि तैरते रहने के लिए, उन्हें शारीरिक या लाक्षणिक रूप से किसी और के कंधों पर अपना पैर रखना होगा।

निष्कर्ष: लेंस को अंदर की ओर मोड़ना

इस दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए, हमें उस व्यक्ति को देखना बंद करना होगा जो टूट रहा है, और उस कमरे की वास्तुकला (architecture) को देखना शुरू करना होगा जिसमें वह खड़ा है।

जब भी आप किसी ऐसे सामाजिक दायरे, कॉर्पोरेट टीम, या संयुक्त परिवार का सामना करें जो किसी एक व्यक्ति को स्थायी रूप से "बर्बाद या मानसिक रूप से बीमार" बाहरी व्यक्ति के रूप में दिखाता है, तो खुद से यह व्यवस्थागत सवाल पूछें:

  • इस व्यक्ति की विफलता बाकी समूह के लिए क्या राहत खरीद रही है?

  • वे किस चिंता और तनाव को अपने अंदर सोख रहे हैं ताकि बाकी सभी लोग रात को आराम से सो सकें?

इस डायनामिक को पहचानना बेहद असहज है क्योंकि यह हमें अपनी खुद की मिलीभगत का सामना करने के लिए मजबूर करता है। यह हमसे यह स्वीकार करने को कहता है कि हमने, कई बार, सिर्फ इसलिए "समझदार", "सफल", या "सामान्य" होने के सुख को स्वीकार कर लिया क्योंकि जब समूह ने किसी एक को नीचे डूबने के लिए 'बलि का बकरा' बनाया, तो हम चुपचाप तमाशा देखते रहे। लेकिन इस तंत्र को स्पष्ट रूप से देखना ही अपनी खुद की स्थिरता के लिए दूसरे इंसानों को लंगर (anchor) की तरह इस्तेमाल करना बंद करने का एकमात्र तरीका है।

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